शिक्षामित्र ने किया खुलासा, अधिकारी लीपापोती में व्यस्त, सरकार की मंशा पर उठे सवाल।
जिले के विकास खण्ड खेसरहा अन्तर्गत प्राथमिक विद्यालय महुलानी टीकुर में मिड-डे मील योजना की भारी लापरवाही सामने आई है। विद्यालय की शिक्षामित्र अनिता राय ने बयान में यह पुष्टि हुई है कि पिछले 15 दिनों से स्कूल में मिड-डे मील नहीं बन रहा। बच्चों के पौष्टिक भोजन और उपस्थिति बढ़ाने के लिए प्रदेश सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन यह मामला जमीनी सच्चाई को उजागर करता है। शिक्षामित्र अनिता राय ने बयान में साफ कहा है कि करीब आधे महीने से बच्चों को मिड-डे मील नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी बताया कि बच्चे भूखे घर लौटते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य और पढ़ाई दोनों पर असर पड़ रहा है। इस सम्बन्ध में बीईओ से जब उक्त मामले को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने दावा किया कि वे विद्यालय गये थे और बच्चों से पूछने पर बच्चों ने बताया कि भोजन बना था। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि विद्यालय में भोजन किस समय बनता है, तो उन्होंने उल्टा मीडिया से ही सवाल कर दिया-आप बता दीजिए भोजन का समय क्या होता है? यह प्रतिक्रिया स्वयं में बताती है कि अधिकारी न तो गाइडलाइन से अवगत हैं और न ही बच्चों के भोजन की जिम्मेदारी को गम्भीरता से ले रहे हैं। बाद में उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि वे दोपहर 12 से 1 बजे के बीच विद्यालय गये थे और बच्चों ने बताया कि भोजन बना था। जबकि शिक्षामित्र का बयान इससे बिलकुल उलट है। दोनों के दावों में यह विरोधाभास विभागीय लीपापोती की ओर इशारा करता है। क्या खाद्यान्न विद्यालय तक पहुंच ही नहीं रहा? या बीच में ही गायब कर दिया जाता है? सरकार द्वारा बच्चों के भोजन पर करोड़ों रुपये खर्च किये जा रहे हैं। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या खाद्यान्न विद्यालय तक सही मात्रा में नहीं पहुंचता? क्या विद्यालय में पहुंचने के बाद पोषाहार की बन्दरबांट हो रही है? क्या अधिकारी और कर्मचारी मिलकर योजना को ठप कर रहे हैं? यह घटना शिक्षा विभाग की जमीनी हकीकत और मिड-डे मील योजना की वास्तविक स्थिति को सामने रखती है। इस मामले में बेसिक शिक्षा अधिकारी शैलेश कुमार से बात की गई तो उन्होंने कहा कि जांच कराई जायेगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी। हालांकि जिले में ऐसे कई मामलों में महीनों तक “जांच जारी है” का बोर्ड लगा रहता है, और कार्रवाई कभी नहीं होती। ऐसे में आशंका है कि यह मामला भी फाइलों में धूल खाता रह जाएगा और बच्चों के हिस्से का भोजन फिर किसी और की जेब में चला जायेगा।
